भाषा ही हमारे विचारों के संप्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम है। मनुष्य के अंतर का दर्पण है। इसके द्वारा ही पता चलता है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्तर क्या है? भाषा के द्वारा ही हम किसी दूसरे व्यक्ति के भावों, विचारों के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त करते हैं। भाषा का संबंध व्यक्ति की मानवीय संवेदनाओं और मानसिकता से भी होता है। जिस व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य और मानसिकता निम्न स्तर की होगी, उसकी भाषा उसी स्तर की रहेगी। बेहतर मानसिक संवेदना वाले व्यक्ति की भाषा भी संस्कारी एवं स्तरीय होगी। अतः भाषा का संस्कारित होना अनिवार्य प्रक्रिया है।
सूत्रकृतांग सूत्र में श्रमणधर्म के भाषा-विवेक सूत्र प्राप्त होते हैं जो श्रावक-श्राविका आदि जनसामान्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने में आधारभूत सिद्ध हो सकते हैं।
सूत्रकृतांग के अनुसार 'होलावायं सहीवायं, गोतावायं च णो वदे' — होलावाद, सखिवाद एवं गौत्रवाद का सेवन श्रमण के लिये निषिद्ध है।
होलावाद से तात्पर्य किसी को नीच सम्बोधन से अपने पास बुलाना है, जैसे — ऐ नीच, रे चोर, ऐ दुष्ट, ए पापी, अरे ओ बहरे, ऐ काणे, अरे कालिये, ओ मूरख आदि। सखी, मित्र, यार कहकर सम्बोधित करना सखिवाद है; गौत्र का नाम लेकर पुकारना गौत्रवाद है। उपरोक्त होलावाद, सखिवाद एवं गौत्रवाद का प्रयोग करना हमारे व्यक्तित्व का नकारात्मक पहलू है। जनसामान्य द्वारा इस प्रकार के सम्बोधन करते हुए देख उनका अनुकरण करने से स्वाभाविक रूप से हमारी ऐसी ही आदत बन जाती है, जो कई बार हमारे समक्ष बहुत बड़े संकट उपस्थित कर देती है।
लखारे की एक कहानी यहाँ उल्लेखनीय है, जो एक गाँव से दूसरे गाँव गधी पर चूड़ियाँ आदि ढोकर जाता था। रास्ते में गधी को "बाईसा जल्दी चलो! बाईजी जल्दी चलो!" के सम्बोधनों से पुकारते देख लोग उससे पूछते कि तुम इस गधी को बाईसा, बाईजी आदि नामों से क्यों पुकार रहे हो। लखारे द्वारा दिया गया उत्तर हमारे लिये अनुकरणीय है — "मैं बड़े-बड़े ठिकानों में चूड़ियाँ बेचता हूँ, जहाँ महिलाएँ मुझसे भाव-ताव भी करती हैं, कई बार बहस भी हो जाती है, कभी मजाक भी। ऐसे में मेरे मुँह से गलती से भी कभी गधी शब्द निकल जाय तो बड़ी मुसीबत भी आ सकती है। इसीलिये मैं इस गधी को भी बाईसा और मास्सा कहता हूँ।" होलावाद से बचने के लिये ऐसे शब्दों को हमारे दैनिक वार्तालाप में शामिल ही नहीं करना चाहिये।
'यार' शब्द कई पाठकों का तकिया कलाम होता है। चलते हैं यार! यार मेरी बात मान ले! क्या करूँ यार। यार कितनी सर्दी है। पापा यार मुझे यह ड्रेस दिला दो। मम्मी यार बहुत भूख लग रही है। — जैसे वाक्यों का प्रयोग सामान्य रूप से दृष्टिगोचर होता है। कई बार यह आदत हमारे लिये जी का जंजाल बन जाती है। उच्च प्रशासनिक अधिकारियों, सम्माननीय व्यक्तियों के समक्ष ऐसी भाषा का प्रयोग करते समय उनके कोप का भाजन बनना पड़ता है। "यार शब्द का प्रयोग करने पर क्या मैं तुम्हें अपना यार लगता हूँ" जैसे प्रश्नों का सामना भी करना पड़ता है। इस प्रकार सखिवाद का प्रयोग हमारे व्यक्तित्व को भी कमजोर बनाता है, जिससे हमें बचना चाहिये।
गौत्र और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने के बाद भारत में यदा-कदा राजनेताओं को भी गंभीर विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ता है। भारत के संविधान में अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के प्रति जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने पर गंभीर अपराध का प्रावधान भले ही कुछ दशकों पूर्व हुआ हो, जैनागमों में शताब्दियों से गौत्रवाद का निषेध किया गया है। होलावाद, सखिवाद एवं गौत्रवाद का सेवन न करके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाया जा सकता है।
मतिट्ठाणं विवज्जेज्जा, अणुविइ वियागरे॥
अपना पांडित्य प्रदर्शन करने, अपने आपको बड़ा दिखाने के लिये या किसी को छोटा दिखाने के लिये बीच में नहीं बोलना चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से बड़ों की आशातना एवं स्वयं के अभिमान की अभिव्यक्ति होती है। भाषा समिति का माहात्म्य बताते हुए शीलांकाचार्य विवेचित करते हैं कि जो साधु भाषा समिति से युक्त है वह धर्मकथा का उपदेश करता हुआ भी मौनी के समान है। ऐसा साधु जो वचन विभाग को जानने में निपुण है, वह दिन भर बोलता हुआ भी मौनी के समान है।
ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिये जो किसी के मन में चुभने या पीड़ा पहुँचाने वाली हो, चाहे ऐसा वचन सत्य ही क्यों न हो। "यह मेरा है" ऐसा सोचकर किसी के प्रति पक्षपातयुक्त वचन नहीं कहना चाहिये। जिस वचन को कहने से किसी को दुःख, पीड़ा, भय, चिन्ता, मानसिक क्लेश हो, ऐसी वाणी नहीं बोलना चाहिये। जो भाषा किसी भी श्रोता को पापकर्म करने के लिये प्रेरित करती हो — जैसे इसे मारो, इसे पीटो, चोरी करो — ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिये। ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिये जो चाटुकारिता, दीनता या स्वहीनता से भरी हो। जो भाषा सत्य होते हुए भी मन में सन्देहास्पद हो, द्वयर्थक हो, सहसा अविचारपूर्वक बोली गई हो, उसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। जिस भाषा के बोलने के बाद पश्चाताप करना पड़े, वह नहीं बोलना चाहिये। जिस बात को सभ्य लोग प्रयत्नपूर्वक छिपाते हैं उसे प्रकट करने वाली या किसी गुप्त बात को प्रकट करने वाली भाषा नहीं बोलना चाहिये।
स्वस्थ और संस्कारी भाषा कभी भी दूसरों को दुःख पहुँचाने वाले शब्दों के प्रयोग की अनुमति नहीं देती है। अतः मनुष्य के लिए भाषा का महत्व सिर्फ उसकी अभिव्यक्ति क्षमता या संप्रेषण क्षमता में ही नहीं है, बल्कि व्यक्ति, जाति, संस्कृति को उजागर करने की क्षमता भी उसमें शामिल होती है। समाज में रहकर संप्रेषण-व्यवहार या लोगों से बातचीत के लिए मनुष्य के पास भाषा ही एकमात्र विकल्प है। बातचीत के दौरान वक्ता और श्रोता की भूमिका बदलती है — वक्ता अपने विचारों को बोलकर संप्रेषित करता है और श्रोता उन्हें सुनकर ग्रहण करता है। इसी भाषिक संप्रेषण के द्वारा पारिवारिक, राष्ट्रीय और व्यक्ति का निजी संप्रेषण बाधा-रहित भी संभव हो सकता है, इसलिए भाषा के संस्कारों का महत्व निर्विवाद है। सूत्रकृतांग में वर्णित भाषा-विवेक के सूत्रों को अपनाकर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को निर्मल बना सकता है।
— निदेशक, प्राज्ञ ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स
बिजयनगर (राज.)