शोध आलेख · Republished Research Article

पर्सनलिटी डिसऑर्डर और आर्त्तध्यान: भेद, लक्षण एवं उपचार

आचार्य नानेश प्रणीत समीक्षण ध्यान के विशेष संदर्भ में
— डॉ. नवलसिंह जैन
श्रमणोपासक, बीकानेर · 15–16 फरवरी 2023 · पृष्ठ 55–58 · संस्कार सौरभ
DOI: 10.5281/zenodo.21454152
यह आलेख श्रमणोपासक (बीकानेर) के 15–16 फरवरी 2023 अंक में प्रथम प्रकाशित हुआ तथा सम्पादक की अनुमति से यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित है। | First published in Shramanopasak, Bikaner (15–16 February 2023); republished here with the kind permission of the editor.

दीप्ति पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी करती है। मेहनत, निष्ठा एवं कार्य के प्रति समर्पण के कारण ऑफिस में उसके सहकर्मी ही नहीं, उच्चाधिकारी भी उसका बहुत सम्मान करते हैं। दीप्ति के पति भी एक कॉरपोरेट कंपनी में मैनेजर हैं। उनके 8 साल का एक बेटा और 5 साल की एक बेटी शहर के सबसे महँगे स्कूल में पढ़ते हैं। बेस्ट लोकेशन में 3 BHK फ्लैट, लक्जरी कार और केयर करने वाले पति सहित दीप्ति के पास वो सब कुछ है जो वर्तमान में किसी लड़की को चाहिए। पीहर और ससुराल में भी उसकी बहुत इज्जत है। उसे सदैव सर-आँखों पर रखने वाले उसके सास-ससुर और उसके माता-पिता बारी-बारी से वहीं आकर उनके साथ रहते हैं ताकि उनके बच्चों की अच्छी देखभाल हो सके। कहने को तो दीप्ति एक खुशहाल जीवन जी रही है किंतु वो स्वयं भीतर से खुशी महसूस नहीं करती है। उसके मन में एक अज्ञात भय, एक चिंता और एक निराशा का भाव हमेशा रहता है। सोते, बैठते, जागते एक ही बात उसके दिमाग में घूमती रहती है कि जीवन में जो सुविधाएँ उसने जुटाई हैं कहीं छिन नहीं जाएँ। कहीं उसका डिमोशन नहीं हो जाए, कहीं इतने अच्छे पैकेज वाली नौकरी नहीं छूट जाए, कहीं उसके पति की नौकरी नहीं चली जाए। अगर ऐसा हो गया तो इतने महँगे फ्लैट की EMI कैसे भरेगी! लग्जरी कार कैसे मेंटेन करेगी! बच्चों को महँगी स्कूल में कैसे पढ़ाएगी! बस इसी डर को मन में रखते हुए उठते ही नमस्कार मंत्र का स्मरण करती है, ऑफिस जाने से पहले माला भी फेरती है, तब भी बार-बार मन ही मन एक ही प्रार्थना करती है कि जो नौकरी उसने इतनी मेहनत के बाद हासिल की है वो बनी रहे। जो रेपोटेशन उसने कंपनी में बनाई वो कायम रहे। उसके पति की जॉब भी बनी रहे और उनका भी प्रमोशन होता रहे। उसका फ्लैट, कार और बच्चों का महँगा स्कूल वो हमेशा मेंटेन कर सके। ऑफिस जाते और आते समय उसके दिमाग में यही चिन्ता हमेशा चलती रहती है। चित्त उदास हो जाता है, मन खिन्न हो जाता है, दिल में एक दर्द हमेशा बना रहता है। कभी-कभी तो ये विचार इतने हावी हो जाते हैं कि वो चिंताग्रस्त होकर रोने भी लग जाती है। टी.वी. या न्यूज पेपर में कभी कर्मचारियों की छँटनी के समाचार आते हैं तो उसका मन और भी उद्विग्न हो जाता है। वह खिन्न होकर बैठ जाती है, चिन्ताग्रस्त होकर सो जाती है तो कभी चिड़चिड़ी होकर गुस्सा करने लगती है। पति के सामने दीनतापूर्ण बातें करने लगती है और जोर-जोर से चिल्लाते हुए कारुणिक विलाप करने लगती है। सब कुछ अच्छा होते हुए भी दीप्ति के परिवार में खुशहाली का माहौल नहीं है।

दीप्ति की एक बहन तरूणा भी है। तरूणा पढ़ने में एवरेज थी। इंजीनियरिंग में भी उसे अच्छी ब्रांच नहीं मिल पाई तो जैसे-तैसे उसने ग्रेजुएशन करने के बाद बी.एड. कर ली। नीलेश नाम के लड़के से उसकी शादी हो गई। नीलेश दिल्ली में एक मेडिकल कंपनी में एम.आर. है। शादी के तुरंत बाद ही तरूणा को दिल्ली के ही एक नामी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। तरूणा की जिद पर नीलेश ने एसयुवी भी खरीद ली किंतु वह इससे भी संतुष्ट नहीं है। वह अपने छोटे से फ्लैट को छोड़कर पॉश एरिया में बड़े फ्लैट में शिफ्ट होने की जिद पर अड़ी हुई है। तरूणा अपनी बहन दीप्ति से महिने में एक-दो बार वीक-एंड पर जरूर मिलती है। सभी साथ में शॉपिंग करने जाते हैं, महँगे रेस्टोरेंट में खाना खाते हैं और वीक-एंड एंजॉय करते हैं। नीलेश महँगे रेस्टोरेंट में खाना और ब्रांडेड शोरूम से शॉपिंग करना अफोर्ड नहीं कर सकता है। इसलिए वो कुछ न कुछ काम का बहाना बनाकर घर पर ही रुक जाता और तरूणा अकेले ही अपनी दीदी से मिलने चली जाती। तरूणा के मन में एक ही विचार चलता रहता कि वो कैसे अपनी बहन और अन्य सहेलियों की तरह अच्छे पैकेज वाली नौकरी प्राप्त करे? कैसे महँगे फ्लैट और लक्जरी कार मेन्टेन करे? नीलेश कैसे ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाए ताकि वह भी विदेश में छुट्टियाँ मनाने जाए? वह हर वक्त यही सोचती रहती कि अभी तो बच्चे भी नहीं है और बच्चे होने के बाद वो अपनी गृहस्थी कैसे मेंटेन करेगी? कैसे अच्छे स्कूल में एडमीशन दिलाएगी? सोते-जागते, उठते-बैठते एक ही चिंता, एक ही विचार, एक ही ध्यान कि किस तरह से इनकम बढ़े? किस तरह से उसका जीवन लक्जीरियस हो? ऐसा नहीं होता देख वह निराश हो जाती। निराशा और हताशा गुस्से में बदल जाती और वो अपना आपा खो बैठती। चिंता का अतिरेक होने पर चिल्लाने लग जाती, रोने लग जाती और कारुणिक विलाप करने लग जाती है। कभी-कभी तो पागलपन की हरकतें करते हुए सामान उठाकर फैंकने लग जाती तो कभी मरने-मारने की बातें करने लगती। नीलेश, तरूणा के ताने सुन-सुनकर, उसे दुःखी होता, रोता देखकर स्वयं भी परेशान रहने लगा है। वैवाहिक जीवन को लेकर जो सपने उसने संजोये थे वे सब व्यर्थ जान पड़ रहे हैं। अपने दोस्तों से यह सब बात शेयर करने पर उन्होंने नीलेश को बताया कि तरूणा को पर्सनलिटी डिसऑर्डर है और उसे किसी अच्छे मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए, किन्तु तरूणा यह सब मानने के लिए तैयार नहीं है। समृद्धि और धन की चाह में कई धार्मिक अनुष्ठान भी करने लगी है। उपवास, नवपद ओली, त्याग-पच्चक्खाण और सामायिक भी इस मनोकामना से करती है कि उसे धन लाभ प्राप्त हो जाए।

इधर दीप्ति और तरूणा के पिता रोशनलाल अपने स्वास्थ्य को लेकर असामान्य रूप से जागरूक हैं। मामूली-सा सर्दी-जुकाम होते ही या एक छींक आते ही उनको लगता है कि कहीं उन्हें कोरोना जैसी बीमारी तो नहीं हो गई है। सामान्य-सा सिरदर्द होने पर ब्रेन हेमरेज होने का डर सताने लगता है तो पेट दर्द होने पर यह विचार आने लग जाता है कि कहीं उन्हें कैंसर तो नहीं हो गया और फिर चिंताग्रस्त होकर रोने लग जाते हैं। जब तक छोटी से छोटी बीमारी ठीक नहीं हो जाती लाख जतन करते हैं। तरह-तरह की दवाइयाँ और टेस्टिंग शुरू हो जाती है। अति तो तब हो जाती जब वह डॉक्टर को भी तरह-तरह की टेस्टिंग लिखने की सलाह देते हैं। जब तक बीमारी ठीक नहीं होती घर में कोहराम मचा रहता है। रोना, चीखना, चिल्लाना, खीझना, विलाप करना जारी रहता है।

दीप्ति, तरूणा और रोशनलाल के व्यवहार को मनोविज्ञान में बॉर्डर लाइन पर्सनलिटी डिसऑर्डर (BPD) या इमोशनली अनस्टेबल पर्सनलिटी डिसऑर्डर (EUPD) एवं निगेटिव अफेक्टिविटी (NA) भी कहा जाता है। उपरोक्त सभी मानसिक विकार जैनागमों में वर्णित आर्त्तध्यान के प्रकारों एवं लक्षणों से साम्य रखते हैं।

आर्त्तध्यान: स्वरूप एवं प्रकार

आर्त्तध्यान के प्रकार एवं लक्षणों का विवेचन आगमों (स्थानांग 4.60–62) एवं तत्त्वार्थ सूत्र (9.30–33), ज्ञानार्णव आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है।

अभीष्ट पदार्थ का वियोग होने पर उसके संयोग के लिए, अनिष्ट का संयोग होने पर उसके वियोग के लिए तथा पीड़ा के विनाश के लिए जीव का निरन्तर स्मरण या चिंतन आर्त्तध्यान कहलाता है।

आर्त्तध्यान के लक्षण

स्थानांग सूत्र 4.62 में आर्त्तध्यान के चार लक्षण बताए हैं—

ध्यानशतक गाथा (16–17) में आर्त्तध्यान के अन्य लक्षण भी बताए हैं :— बात-बात में शंका करना, भय, प्रमाद, असावधानी, क्लेशजन्य कार्य, ईर्ष्या वृत्ति, चित्त भ्रम, भ्रान्ति, विषय सेवन की उत्कण्ठा, निरंतर रोना, सोये रहना, शिथिलता, कायरता, चित्त में खेद, वस्तु में मूर्च्छा, निंदक प्रवृत्ति, दूसरे की संपत्ति को देखकर विस्मित होकर प्रशंसा करना, उसे पाने की अभिलाषा करना, मन में जलन, कुढ़ना, धन में आसक्ति रखना, शुद्ध धर्म से परांगमुख होना, जिन वचन का अनादर करना, देव गुरु धर्म पर श्रद्धा न होना आदि।

उपचार: मनोचिकित्सा एवं समीक्षण ध्यान

मनोचिकित्सक इस प्रकार के डिसऑर्डर का उपचार टॉक थेरेपी, काउंसलिंग एवं दवाइयों द्वारा करते हैं। मानसिक चिकित्सा में दवाइयों का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है।

जैनधर्म में चित्त के निरोध को ध्यान कहा है। मन की चंचलता को समाप्त करने का अभ्यास ही ध्यान है। किन्तु आर्त्तध्यान व्यक्ति में सहज ही होता है। इसके लिए व्यक्ति को प्रयत्न नहीं करना पड़ता। आर्त्तध्यान को छोड़ने की संभावना केवल उसी व्यक्ति में हो सकती है, जिसका विवेक जागृत हो और जो अच्छा-बुरा देख सकता हो। समीक्षण का तात्पर्य है सम्यक् प्रकार से देखना, निरीक्षण करना। पूज्य नानेश प्रणीत समीक्षण ध्यान में आर्त्तध्यान का उपचार निहित है। समीक्षण ध्यान के विभिन्न अंग — 1. शिथिलीकरण 2. श्वास समीक्षण 3. देह समीक्षण 4. चैतन्य समीक्षण 5. कषाय समीक्षण 6. इन्द्रिय समीक्षण 7. भावना समीक्षण — आर्त्तध्यान का उपचार है। इनमें भावना समीक्षण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। भावना या अनुप्रेक्षा का समीक्षण एक आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति है।

स्वयं आचार्य श्री नानेश के शब्दों में — ''आगमों में आर्त्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ध्यान का जो गहनतम विवेचन उपलब्ध होता है वह सब समीक्षण का ही विविध रूपी विश्लेषण है। धर्मध्यान और शुक्लध्यान की जो भावनाएँ-अनुप्रेक्षाएँ बताई गई हैं वे समीक्षण की विविध आयामी पद्धतियाँ ही हैं। इस प्रकार मन को किंवा मनोयोग को स्वस्थ दिशा प्रदान करने वाली विधियाँ, प्रणालियाँ एवं पद्धतियाँ हैं वे सब समीक्षण ध्यान की विधियाँ मानी जा सकती हैं।'' (समीक्षण ध्यान : एक मनोविज्ञान, पृष्ठ 5)

भावना समीक्षण: चार अनुप्रेक्षाएँ

1. अनित्यानुप्रेक्षा : इस संसार में सब कुछ अनित्य (temporary) है। यह शरीर अनित्य है। परिवार, धन और यौवन सब कुछ अनित्य है। सुख, संपदा अनित्य हैं। नित्य (permanent) तो कुछ है ही नहीं। यह शरीर नष्ट होगा, धन-सम्पति नष्ट होंगी और प्रियजन भी बिछड़ेंगे यह तय है। संसार की प्रत्येक वस्तु एवं पदार्थ की अनित्यता का चिंतन करना ही अनित्य अनुप्रेक्षा है। सच्चाई को जानने पर व्यक्ति दुःख को केवल जानता है, वह कभी दुःख को भोगता नहीं है।

2. अशरणानुप्रेक्षा : जिसको तुम अपना मान रहे हो वे स्वजन, परिवारजन तुम्हें शरण देने में, तुम्हारे दुःख दूर करने में, बुढ़ापे और मृत्यु से बचाने में समर्थ नहीं हैं। तुम भी उनके दुःख दूर करने में, शरण देने में, मृत्यु से बचाने में समर्थ नहीं हो। धन, परिवार, रिश्तेदार, मंत्र-तंत्र आदि कोई भी बुढ़ापे और मृत्यु से बचा नहीं सकते। धर्म ही शरणप्रदाता है।

3. संसारानुप्रेक्षा : संसार की विचित्रताओं का चिन्तन करना। जैसे एक जन्म की माता अन्य जन्म में स्त्री, पुत्री या बहन बन जाती है। एक जन्म का पिता दूसरे जन्म में पुत्र भी हो सकता है। जैन धर्म के अनुसार, पिछले अनंत जन्मों में हर जीव के सभी जीवों के साथ सभी तरह के रिश्ते-नाते हो चुके हैं। संसार एक नाट्यशाला के समान है। संसार में आने का अर्थ है नाट्यशाला में आना, अपना अभिनय करना और पुनः लौट जाना।

4. एकत्वानुप्रेक्षा : मैं अकेला हूँ, मेरा कोई नहीं और न मैं किसी का हूँ — इस प्रकार अकेलेपन का अनुभव करना। माता-पिता या परिवार का कोई भी सदस्य सुख-दुःख में सहभागी नहीं होता, जन्म-मरण में भी साथी नहीं बनता। जीव अकेला आता है और अकेला जाता है। अपने पूर्वकृत् कर्मों से ही दुःख-सुख को प्राप्त होता है। यह जीव अकेला ही गर्भ में आता है, अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही बाल, यौवन एवं वृद्धावस्था को प्राप्त होता है, अकेला ही शोकग्रस्त होता है और अकेला ही मरण को प्राप्त करता है। वास्तव में उत्तम क्षमादि दस धर्म ही चार गतियों के दुःख से बचा सकता है।

— निदेशक, प्राज्ञ ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स
बिजयनगर (राज.)