मम्मी! देखो यह कितनी सुन्दर पोशाक है, प्राइज भी कितनी कम है और मात्र एक ही बची है। इसे ऑनलाइन मँगाना भी नि:शुल्क है। क्या मैं मँगवा लूँ? नयना ने मोबाइल में पोशाक का चित्र दिखाते हुए अपनी मम्मी से कहा।
मम्मी—''नहीं, नयना अभी कोई पोशाक की जरूरत नहीं है, पहले ही तुम्हारे पास ढेरों कपड़े पड़े हैं, उनमें से कई को तो तुमने एक बार भी नहीं पहना है और कई एक-दो बार पहन कर छोड़ दिये हैं।''
नयना—''मम्मी! जब कोई अवसर होगा तब पहनूँगी न। ऐसे ही घर में कौन पहनता है?''
मम्मी—''जब तक अवसर आएगा तब तक इन कपड़ों को पुराना चलन बताकर फिर से खरीदने की बात करोगी। पिछली बार मामा की शादी में जो कपड़े खरीदे थे, उनमें से तीन जोड़ी तो तुमने आज तक नहीं पहने हैं। तीन-तीन हजार की पोशाक अलमारी की शोभा बढ़ा रही हैं।''
नयना—''मम्मी! आप देख नहीं रही हो क्या, मेरे शरीर का कद बढ़ रहा है। अब छोटी पोशाक कैसे पहनूँगी?''
मम्मी—''नयना! तुम्हें मैंने कहा था कि एक साथ इतनी पोशाक मत खरीदो। दो हजार के गिफ्ट वाउचर के चक्कर में पूरे 20 हजार की खरीददारी कर ली और ऐसे कपड़े खरीद लिये जो तुमने आज तक पहने ही नहीं।''
नयना—''मम्मी! क्या सारे नियम मुझ पर ही लागू होते हैं। आपके पास भी तो ऐसी ढेरों साड़ियाँ पड़ी हैं, जो आपने आज तक नहीं पहनी है। फिर हर बार आपको नानी के यहाँ से दो-तीन साड़ियाँ मिल जाती हैं। आप खुद ही तो कहती हो कि मैंने शादी का 20 हजार का लहँगा केवल एक बार ही पहना है, इतने का सोना लिया होता तो दो लाख का हो जाता। मेरे पास तो ऐसी कोई पोशाक नहीं है जो इतनी महँगी हो और मैंने एक बार भी खरीदी हो। आपके पास इतनी साड़ियाँ होते हुए भी आप पर्युषण में व्याख्यान में जाने के लिए आठ दिन के लिए आठ साड़ियाँ खरीदकर लाए हो।''
अपनी मम्मी और बहन की बातें सुन रहा मयंक भी बीच में बोल पड़ा।
मयंक—''अब तो हद हो गई, कोरियर और पार्सल लाने वाले लड़के को अपनी नयना का घर तक याद हो गया है। कल मेरा पार्सल आया था। पता समझते समय डिलीवरी वाले लड़के ने पूछा यह नयनाजी का ही पता है न। नयना दी! अब तो ऑनलाइन खरीददारी कम कर दो, मुझे तो यह डर लगने लगा है कि कहीं अपना घर कपड़े की दुकान न बन जाये।''
नयना—''मयंक! तुम ज्यादा शरीफ मत बनो। तुम जो एक साथ दस-दस पोशाकें खरीदते हो उसका क्या? और जो व्यायाम के नाम पर हर बार नई पोशाक लेकर आते हो और दो दिन भी व्यायाम नहीं करते हो। तुम्हारा योगा करने का आसन धूल खा रहा है। जुराबों के जोड़ीदार ही गायब हो जाते हैं। नए के नए मौजों के पोछे बनाने पड़ रहे हैं। तुम्हारे पास भी ढेरों पोशाकें होने के बाद भी कहीं जाना हो तो अलमारी के सामने खड़े होकर यही सोचते रहते हो कि क्या पहनूँ?''
वस्तुत: कपड़ों की अनाप-शनाप खरीददारी और उस पर फिजूलखर्ची मात्र किसी एक परिवार की समस्या नहीं है। बदलते जमाने के साथ बदलते इस फैशन के दौर का, आज हर कोई शिकार है। दुनिया में तेजी से सब कुछ बदल रहा है, इस बदलते हुए जमाने में सभी लोग खुद को बदलते देखना चाहते हैं। खासतौर पर युवा अपने को अलग दिखाने की कोशिश में लगे हैं। कपड़े खरीदने की लत इस हद तक लग गई है कि आर्थिक अभाव होने के बाद भी कपड़ों पर फिजूलखर्ची हो जाती है। अलमारी में बहुत से नये कपड़े रखे रहते हैं। बहुत बार आप ऐसे कपड़े खरीद लेते हैं जिनकी जरूरत ही नहीं होती है। बहुत-सी बार इसलिये कपड़े खरीद लेते हैं, क्योंकि वे सस्ते या एक के साथ एक फ्री मिल रहे होते हैं। ऑनलाइन कपड़े खरीदने या मँगवाने एवं पार्सल मिलने पर स्वयं को उत्साहित महसूस करते हुए पार्सल खोलते हैं। कई बार ग्लानि महसूस होती है कि खरीदा हुआ कपड़ा घर लेकर आते हैं और फिर उसे नापसन्द करते हैं। हर कोई स्वयं को सुसज्जित दिखाना चाहता है या अपने डिजाइनर कपड़ों का दिखावा करना चाहता है। हर मौके के लिए कपड़े खरीदना आदत बन गई है। पिछले 15 वर्षों में वैश्विक स्तर पर कपड़ों का उत्पादन दोगुना हो गया है। वहीं किसी कपड़े को पहने जाने का औसत समय भी कम हो रहा है।
मार्च 2018 में जेनेवा में 'फैशन एण्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स : व्हाट रोल फॉर द यू.एन.?' नाम के कार्यक्रम में यू.एन.ई.सी.ई. ने आगाह किया कि फैशन कारोबार में जिस तरह कपड़ों का बड़ी मात्रा में उपयोग किया जा रहा है वह एक 'पर्यावरण और सामाजिक आपातकाल' दर्शाता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक एक टी-शर्ट को बनाने में तकरीबन 2,700 लीटर पानी लगता है, जिसे हम कुछ दिन पहनने के बाद कचरे में डाल देते हैं। हर साल उत्पादित 100 अरब कपड़ों में से 92 मिलियन टन कचरों में फेंक दिया जाता है। यानी कपड़ों से भरा एक ट्रक कचरा हर सेकेण्ड कचरों का पहाड़ बनाने के लिए तैयार होता है। अगर यही स्थिति निरन्तर जारी रही तो हर साल कचरे का अम्बार बढ़कर 134 मिलियन टन हो सकता है। इस दशक के अन्त तक वस्त्र उद्योग का वैश्विक उत्सर्जन दोगुना हो जाएगा।
कपड़ों की रंगाई करना भी एक जटिल समस्या है। कपड़ों को रंगाई करने के लिए जिन रसायनों का प्रयोग किया जाता है, वे पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक होते हैं। कपड़ों के प्रसंस्करण एवं रंगाई की रसायन प्रक्रिया से लगभग 20 प्रतिशत जल प्रदूषण होता है। इण्डोनेशिया में सिटरम नदी और इसके पास बसी मानवीय बस्तियों और वन्य जीवों को वस्त्र उद्योग ने काफी गम्भीरता से प्रभावित किया है। इसी तरह तमिलनाडु में तिरुपुर, राजस्थान के पाली एवं बालोतरा में वस्त्र उद्योग प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत बन गया है और इस क्षेत्र में कृषि एवं जल स्रोतों को पूरी तरह से नष्ट करने में इसकी बड़ी भूमिका हो गई है।
उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत है समाधान
जैनागमों में साध्वियों के लिए 96 हाथ एवं साधुओं के लिए 72 हाथ तक वस्त्र रखने का नियम है। श्रावक-श्राविकाओं के लिए इस सन्दर्भ में कोई निश्चित प्रावधान नहीं हैं। आचार्यश्री हेमचन्द्र ने योगशास्त्र में धर्माधिकारी या श्रावक के आवश्यक 35 गुणों में 'वित्तानुसार वेश' को एक गुण बताया है। गृहस्थ जीवन में वेश का महत्त्व है। वेश से व्यक्तित्व की पहचान होती है। अपनी वित्तीय स्थिति, वय, देश, काल और कुलाचार को ध्यान में रखकर वेश धारण करना चाहिये। उक्त मर्यादाओं को ध्यान में न रखने से लोक में उपहास का पात्र होना पड़ता है। विवेकवान् गृहस्थ के लिए अपनी वेशभूषा सात्त्विक, स्वच्छ और सुरुचिपूर्ण रखना चाहिये। धर्म के अभिमुख होने की योग्यता प्राप्त करने का यह भी एक मानदण्ड है।
श्रावक का दूसरा गुणव्रत उपभोग-परिभोग परिमाणव्रत है। इस व्रत में दैनिक उपयोग में आने वाली 26 प्रकार की वस्तुओं की मर्यादा की जाती है। वस्त्र के सम्बन्ध में मर्यादा करना कि मैं अमुक किस्म के इतने वस्त्रों से अधिक वस्त्र नहीं पहनूँगा। इस प्रकार की मर्यादा करना वत्थविहि परिमाण कहलाता है।
पाठकों के लिए कुछ सुझाव दिये जा रहे हैं जिन्हें अपनाकर सरलता से कपड़ों के परिग्रह को कम कर वत्थविहि परिमाण व्रत का सहजता से पालन किया जा सकता है।
अलमारी की सार-सम्भाल
कपड़ों की एक सूची तैयार करें, जिसमें यह तय करें कि कितने कपड़े समारोह हेतु, कितने आस-पास जाने पर पहनने हेतु तथा कितने रोजाना पहनने के हैं। किस रंग के कितने कपड़े हैं। कितने कपड़े ऐसे हैं जो एक बार भी नहीं पहने हैं। ऐसा करने से आपको अपने पास उपलब्ध कपड़ों की जानकारी रहेगी और फालतू की खरीददारी से बचेंगे। अगर आपको लगता है कि अब आपको रहे हुए कुछ कपड़ों की जरूरत नहीं है तो उन्हें जरूरतमन्दों को दान भी कर सकते हैं।
बनाएँ शॉपिंग लिस्ट
बाजार से सब्जी खरीदने से पहले हम फ्रिज में यह देखकर जाते हैं कि कौन-कौन-सी सब्जी कितनी-कितनी रखी है। किराने की दुकान जाने से पहले भी आवश्यक सामान की सूची बनाते हैं। इसी तरह क्या कपड़े खरीदे जाने से पहले हम सूची बनाते हैं? बिना सूची के खरीददारी का मतलब है बिना जरूरत की चीजों को खरीद लेना। अगर आप बिना सूची लिये खरीददारी के लिए जा रहे हैं मतलब कि आप निश्चित रूप से ऐसी चीजें खरीदेंगे जिनकी आपको वाकई जरूरत है ही नहीं। बाजार जाने से पहले आवश्यकता के कपड़ों की सूची बनायें और जब खरीददारी करें, अपनी सूची पर कायम रहें।
बाजार और उपभोक्तावाद की समझ
उपभोक्तावाद एवं बाजार के प्रभाव से हम न सिर्फ पहले से अधिक कपड़े खरीद रहे हैं, बल्कि उन्हें पहले के मुकाबले आधे समय ही उपयोग कर रहे हैं। दूसरों से अच्छा दिखने की चाह में नवीनतम फैशन के कपड़े पहन रहे हैं। अल्ट्रा फास्ट फैशन का नवीनतम ट्रेण्ड, जिसमें कैटवॉक लुक और सेलिब्रिटी से प्रभावित होकर फटाफट नए कलेक्शन उतारे जाते हैं, साल की शुरुआत के बाद से, फास्ट फैशन दिग्गज एच एण्ड एम और जारा ने संयुक्त रूप से लगभग 11,000 नये डिजाइन जारी किए हैं। इसी समय अल्ट्रा-फास्ट फैशन ब्राण्ड शीन ने 3 लाख नये डिजाइन जारी करके सबको चौंका दिया है। ग्राहक अधिक से अधिक कपड़े खरीदे, इसके लिए कई तरीके अपनाए जा रहे हैं। एक के साथ एक फ्री, 3 के मूल्य में 5 कपड़े जैसी योजनाओं में कई बार हम ऐसे कपड़े भी खरीद लेते हैं, जिन्हें हम पहनते ही नहीं। ऑनलाइन ऑफर के लोभ एवं अन्तिम पीस बचा है के डर से खरीददारी करना मूर्खता ही है। जब भी कपड़े खरीदें, स्वयं से पूछें कि क्या वाकई मुझे इसकी जरूरत है?
ऑनलाइन खरीदारी के एप्प से दूरी
ऑनलाइन खरीददारी पोर्टल पर समय बिताना, कहाँ क्या सस्ता मिलता है, की रिसर्च, प्रोडक्ट रिव्यू, रेटिंग देने जैसी आदत डालना बाजार का एक ऐसा मकड़जाल है जिसमें उलझा हुआ व्यक्ति समय, धन और मन की बर्बादी करता हुआ हर वक्त मोबाइल पर अपनी अंगुलियाँ घुमाता देखा जा सकता है। इन ऑनलाइन कम्पनियों द्वारा भेजे गये सन्देश भी खरीदने की इच्छा को बढ़ावा देते हैं। मोबाइल से ऐसे एप्लीकेशन को हटाना ही बेहतर विकल्प है।
बनायें अपना फैशन स्टाइल
कुछ साल पूर्व तक प्रत्येक जाति का अपना स्थायी फैशन स्टाइल होता था। महिलाओं एवं पुरुषों के पहनावे के आधार पर ही पता लग जाता था कि ये अमुक जाति के हैं। राजस्थानी संस्कृति में चुंदड़, लहरिया, पोमचा, फाग आदि की परिपाटी वस्त्रों के सीमित उपयोग के प्रयोजन से ही चली आ रही थी। विवाह के समय ससुराल से मिलने वाली चुंदड़ (चूंदड़ी) में ही सभी मांगलिक कार्य यथा देवपूजन, गृहप्रवेश, मायरा, बच्चों की शादियाँ आदि सम्पन्न हो जाते थे। यहाँ तक कि सुहागिन रहते मृत्यु होने पर वही चूंदड ओढ़ाकर अन्तिम यात्रा सम्पन्न की जाती थी।
वर्तमान में फैशन का दौर अस्थायी है। फैशन बदलते ही नया का नया कपड़ा अनुपयोगी मान लिया जाता है। ऐसे में खुद का एक फैशन स्टाइल बनाना वस्त्र उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत पालन करने में सहायक हो सकता है। यूक्रेन के प्रधानमन्त्री जेलेंस्की हमेशा हरे रंग की टी शर्ट पहनते हैं वहीं फैसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने ग्रे रंग की हुडी एवं टी शर्ट को, तो विश्व के सर्वाधिक धनी व्यक्ति बिल गेट्स ने सूट और टाई के स्थान पर सामान्य स्वेटर एवं बटन डाउन शर्ट को अपनी फैशन स्टाइल बनाया है। स्वयं का फैशन स्टाइल स्थायी होता है, अत: कपड़े लम्बे समय तक पहने जा सकते हैं एवं बहुत अधिक कपड़े खरीदने की आवश्यकता भी नहीं होती है।
आजकल कपड़े फटने या पुराने होने पर नहीं, अपितु मन भर जाने से पहनना बन्द कर दिये जाते हैं। पुराने कपड़ों के पुन: उपयोग के उद्देश्य से विदेशों में रिश्तेदार एवं दोस्त एक जगह इकट्ठा होते हैं। अपने घर से स्वयं के एवं बच्चों के ऐसे कपड़े लेकर आते हैं, जिनसे उनका मन भर गया हो। ऐसे कपड़ों की अदला-बदली कर ली जाती है। क्लॉर्थिंग स्वेप पार्टी के अलावा एक ही बार उपयोग में आने वाले जैसे शादी में दूल्हा-दुल्हन के कपड़े किराये पर लेना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
वस्त्र पहनना आवश्यक है, समय अनुरूप अच्छे वस्त्र पहनना भी आवश्यक है, सामाजिक पद प्रतिष्ठा के लिहाज से भी वस्त्रों की उपयोगिता नकारी नहीं जा सकती, किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर टिकाऊ फैशन को विकसित कर बढ़ावा दिया जा सकता है। सस्ते फास्ट फैशन की बजाय अच्छी गुणवत्ता वाले कपड़े खरीदकर, कपड़ों के जीवन को बढ़ाने के तरीके जैसे दाग़ लगते ही तुरन्त दाग़ हटाकर, ड्रायर के बजाय हवा में सुखाकर, तेज धूप की बजाय छाँव में सुखाकर लम्बे समय तक उनका उपयोग किया जा सकता है। संक्षेप में फैशन की वजह से बर्बाद होती पृथ्वी को जैन संस्कृति में निर्दिष्ट उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत के अन्तर्गत वत्थविहि परिमाण का पालन कर बचाया जा सकता है।
— निदेशक, श्री प्राज्ञ महाविद्यालय
बिजयनगर, जिला-अजमेर (राज.)